देवाधिदेव प्रथम तीर्थंकर श्री 1008 आदिनाथ जी भगवान का जीवन चरित्र
अनन्त भवों में तप, साधना और दान धर्म से शोभित आत्मा जब सिद्धत्व की ओर अग्रसर होती है, तब वह सम्पूर्ण जीव जगत के लिए आदर्शों के उच्चतम प्रतिमान स्थापित कर जाती है। असंख्य जन्मों तक साधना कर तीर्थंकर प्रकृति का बंध करने वाली ऐसी ही एक पुण्य आत्मा का अवतरण हुआ था अयोध्या नगरी के महाराज नाभिराय और महारानी मरुदेवी के आँगन में, जो अपनी त्याग-तपस्या और वैराग्य के आलम्बन से आगे चलकर प्रथम तीर्थंकरश्री 1008 आदिनाथ जी भगवान कहलाए।
गर्भ में आने पर माता मरुदेवी को सोलह स्वप्नों का दिव्य दर्शन हुआ और चैत्र कृष्ण नवमी को जब प्रभु ने जन्म लिया तो इन्द्र का सिंहासन हिल उठा और स्वर्गादि के देवताओं ने मंगल-ध्वनि और पुष्पवृष्टि की। इन्द्रदेव ने स्वयं सुमेरु पर ले जाकर क्षीरसागर के जल से उनका अभिषेक किया और ऋषभदेव नाम दिया।
समय बीता और ऋषभदेव के युवा होने पर महाराज नाभिराज ने इन्द्र की आज्ञा से उनका विवाह सुमंगला और सुनन्दा से किया जिनसे भरत चक्रवर्ती और बाहुबली सहित 99 पुत्र और ब्राह्मी एवं सुन्दरी नाम की दो पुत्रियां उत्पन्न हुईं।
अवधिज्ञान के धनी आदिनाथजी ने राजा बनने पर संसार को सभ्यता का पहला पाठ पढ़ाया और कल्पवृक्षों की शक्ति क्षीण होने पर प्रजा को जहां आजीविका के छह मार्ग असि, मषि, कृषि, वाणिज्य, शिल्प और कला का ज्ञान दिया, तो वहीं अपनी पुत्री ब्राह्मी को लिपि एवं सुन्दरी को अंकविद्या प्रदान की। समाज में वर्ण व्यवस्था स्थापित कर उन्होंने अनेकों ग्राम-नगर बसाए। इसी कारण उन्हें आदिब्रह्मा और युगादिपुरुष भी कहा जाता है।
राज्य संचालन के दौरान एक दिन राजदरबार में नीलांजना नर्तकी की अकाल मृत्यु को देखकर उनका हृदय वैराग्य से भर उठा और फिर अपने पुत्र भरत चक्रवर्ती और बाहुबली को राज्य-पाट सौंपकर उन्होंने ‘सिद्धार्थक वन’ में वटवृक्ष तले केशलोंच कर दीक्षा धारण की।
हजार वर्षों के तपोबल के बाद फाल्गुन कृष्णा एकादशी को प्रयाग में वटवृक्ष तले प्रभु को केवलज्ञान प्रकट हुआ। देवों ने बारह योजन का दिव्य समवशरण रचा, जहाँ से उन्होंने जगत् को धर्म का मार्ग दिखाया।
अंततः कैलाश पर्वत पर भगवान ऋषभदेव ने योग निरोध कर माघ कृष्ण चतुर्दशी को प्रातःकालीन बेला में निर्वाण प्राप्त किया और सदैव के लिए सिद्धशिला पर जाकर विराजमान हो गए।
समस्त जीव-जगत को शिक्षा संस्कृति, संस्कार, वर्ण व्यवस्था और आजीविका के साधन प्रदान करने वाले ऐसे महान युगप्रवर्तक एवं प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान की मूलनायक के रूप एक भव्य और मनोज्ञ प्रतिमा लोकोदय तीर्थ में विराजमान होने जा रही है। भगवान की यह भव्य एवं अप्रतिम प्रतिमा सम्पूर्ण मानवता को आत्मस्वरूप का अनंत ज्ञान देने के साथ साथ मोक्षमार्ग पर चलने को प्रेरित करेगी।